बस्तर में नक्सलवाद का अंत शुरू! 31 मार्च की डेडलाइन से पहले सबसे बड़ा आत्मसमर्पण, 210 माओवादीयो ने छोड़ा हथियार,  संविधान की ली शपथ

बस्तर में नक्सलवाद का अंत शुरू! 31 मार्च की डेडलाइन से पहले सबसे बड़ा आत्मसमर्पण, 210 माओवादीयो ने छोड़ा हथियार,  संविधान की ली शपथ

जगदलपुर । राज्य शासन की “पूना मारगेम – पुनर्वास से पुनर्जीवन” नीति ने बस्तर में शांति का नया इतिहास रच दिया है।दण्डकारण्य क्षेत्र के 210 माओवादी कैडरों ने हथियार डालकर संविधान और लोकतंत्र पर आस्था जताई है।मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ सरकार की व्यापक नक्सल उन्मूलन रणनीति अब निर्णायक मोड़ पर पहुँच चुकी है।

ऐतिहासिक आत्मसमर्पण — हिंसा से संवाद की ओर कदम
लंबे समय से नक्सल गतिविधियों से प्रभावित अबूझमाड़ और उत्तर बस्तर क्षेत्र में यह अब तक का सबसे बड़ा आत्मसमर्पण माना जा रहा है।आज जगदलपुर पुलिस लाइन परिसर में हुए इस ऐतिहासिक कार्यक्रम में 210 माओवादी कैडरों ने 153 अत्याधुनिक हथियार — जिनमें AK-47, INSAS, SLR और LMG शामिल हैं — राज्य के समक्ष समर्पित किए।यह केवल हथियारों का समर्पण नहीं, बल्कि हिंसा और भय के युग का अंत और विश्वास, विकास व लोकतंत्र की नई शुरुआत का प्रतीक है।

वरिष्ठ माओवादी भी लौटे – ‘पूना मारगेम’ बनी शांति की राह
मुख्यधारा में लौटने वालों में कई वरिष्ठ और वांछित माओवादी नेता शामिल हैं —
सीसीएम रूपेश उर्फ सतीश, डीकेएसजेडसी सदस्य भास्कर उर्फ राजमन मांडवी, रनीता, राजू सलाम, धन्नू वेत्ती उर्फ संतू, और आरसीएम रतन एलम जैसे कुख्यात नामों ने आज लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास जताया।इन सबने संविधान की प्रति ग्रहण की और “शांति, विकास व राष्ट्रनिर्माण” की दिशा में काम करने की शपथ ली।

“पूना मारगेम – पुनर्वास से पुनर्जीवन” ने दिखाई नई दिशा
राज्य शासन की इस नीति ने यह साबित किया है कि“जहाँ संवाद और विकास पहुँचता है, वहाँ बंदूकें स्वतः मौन हो जाती हैं।”मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की नक्सल उन्मूलन रणनीति — विश्वास, विकास और सुरक्षा के तीन स्तंभों पर आधारित है।

डीजीपी अरुण देव गौतम ने कार्यक्रम में कहा — “पूना मारगेम केवल नक्सलवाद से दूरी बनाने का प्रयास नहीं, बल्कि जीवन को नई दिशा देने का अवसर है। जो आज लौटे हैं, वे बस्तर में शांति और विकास के दूत बनेंगे।”

पुनर्वास योजनाओं से नक्सलियों को नई पहचान
राज्य सरकार ने आत्मसमर्पित माओवादियों के लिए आवास, पुनर्वास सहायता राशि, स्वरोजगार और कौशल विकास योजनाओं की जानकारी दी। लक्ष्य है कि हर लौटे हुए युवक को आत्मनिर्भर और सम्मानजनक जीवन की दिशा में आगे बढ़ाया जाए।

बस्तर की परंपरा में गूँजा ‘वंदे मातरम्’
कार्यक्रम के दौरान मांझी-चालकी परंपरा के तहत आत्मसमर्पित कैडरों का स्वागत किया गया।उन्हें संविधान की प्रति और लाल गुलाब भेंट कर सम्मानित किया गया —जो प्रेम, शांति और नए जीवन का प्रतीक बना।

कार्यक्रम के अंत में सभी कैडरों ने संविधान की शपथ लेकर लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति निष्ठा व्यक्त की।‘वंदे मातरम्’ की गूंज के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ, और बस्तर ने देखा —हिंसा से विश्वास की ओर, बंदूक से विकास की ओर बढ़ता नया इतिहास।

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